Lailunga sandesh 24
Efitor yogesh kumar

गेरवानी में उद्योग विस्तार पर उबाल: शांभवी इस्पात की जनसुनवाई से पहले जनाक्रोश तेज
रायगढ़।
औद्योगिक विस्तार और पर्यावरणीय संतुलन के बीच खिंची रस्साकशी अब गेरवानी में खुलकर सामने आ गई है। शांभवी इस्पात प्राइवेट लिमिटेड के प्रस्तावित विस्तार को लेकर क्षेत्र में असंतोष धीरे-धीरे जनाक्रोश का रूप लेता दिख रहा है। 21 अप्रैल को निर्धारित जनसुनवाई से पहले ही गांव-गांव में विरोध की सरगर्मी तेज हो चुकी है।
स्थानीय ग्रामीणों, किसानों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि गेरवानी और आसपास का इलाका पहले से ही उद्योगों के दबाव में कराह रहा है। धूल-धुएं से भरी हवा, दूषित होते जल स्रोत और घटती कृषि उत्पादकता ने लोगों का जीवन कठिन बना दिया है। ऐसे में एक और इस्पात संयंत्र के विस्तार की योजना ने लोगों की चिंता को और गहरा कर दिया है।
क्षेत्र के वरिष्ठ सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता पितरु मालाकार इस मुद्दे को मुखरता से उठा रहे हैं। उनका कहना है कि “विकास के नाम पर क्षेत्र को लगातार प्रदूषण की ओर धकेला जा रहा है। वायु, जल और भूमि—तीनों स्तरों पर प्रदूषण खतरनाक सीमा पार कर चुका है। अब यदि संयंत्र का विस्तार होता है, तो इसका सीधा असर यहां के लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ेगा।”
गांवों में घूमने पर यह चिंता साफ झलकती है। कई परिवारों ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में श्वास संबंधी बीमारियों, त्वचा रोग और एलर्जी के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है। ग्रामीणों का आरोप है कि उद्योगों से निकलने वाले धूलकण और रासायनिक उत्सर्जन इसका बड़ा कारण हैं।
किसानों की पीड़ा भी कम नहीं है। खेतों की उपज घट रही है, मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। कई कुएं और हैंडपंप अब पहले जैसे पानी नहीं दे रहे, और जो पानी उपलब्ध है, उसकी गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। इससे खेती-किसानी पर निर्भर परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
मुद्दा सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं है। क्षेत्र की सड़कें भी औद्योगिक गतिविधियों का बोझ झेलते-झेलते जर्जर हो चुकी हैं। लाखा, गेरवानी और तराईमाल मार्ग पर भारी वाहनों की आवाजाही ने हालात बिगाड़ दिए हैं। आए दिन होने वाली दुर्घटनाएं अब आम बात बन चुकी हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि हर साल सैकड़ों लोग इन सड़कों पर जान गंवा रहे हैं, हालांकि आधिकारिक आंकड़े अक्सर इस वास्तविकता को पूरी तरह नहीं दर्शा पाते।
सबसे अधिक चिंता बच्चों को लेकर है। स्कूल जाने वाले विद्यार्थियों के लिए सड़क पार करना भी जोखिम भरा हो गया है। अभिभावकों के मन में हर दिन एक अनजाना डर बना रहता है।
रोजगार के सवाल पर भी लोगों में असंतोष है। स्थानीय युवाओं का कहना है कि उद्योगों से रोजगार के जो वादे किए जाते हैं, वे ज़मीन पर पूरी तरह उतरते नहीं दिखते। बाहर से आए श्रमिकों को प्राथमिकता मिलने की शिकायत भी अक्सर सुनाई देती है।
इन सबके बीच पितरु मालाकार और अन्य नागरिकों ने प्रशासन से स्पष्ट मांग की है कि जनसुनवाई महज़ औपचारिकता न बने, बल्कि वास्तव में जनता की आवाज सुनी जाए। उनका कहना है कि जब तक पर्यावरणीय प्रभावों का निष्पक्ष आकलन और ठोस समाधान नहीं प्रस्तुत किया जाता, तब तक इस विस्तार पर रोक लगनी चाहिए।
आंदोलन की चेतावनी भी अब खुलकर दी जा रही है। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि यदि उनकी चिंताओं को नजरअंदाज किया गया, तो वे लोकतांत्रिक तरीके से व्यापक विरोध प्रदर्शन करने के लिए मजबूर होंगे।
गेरवानी की यह स्थिति एक बड़े सवाल की ओर इशारा करती है—क्या विकास की कीमत स्थानीय समाज और पर्यावरण के संतुलन से चुकाई जानी चाहिए? आने वाली जनसुनवाई इस सवाल का जवाब तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
