लैलूंगा के आश्रित ग्राम कटकलीया ( राजूनगर) में धूम -धाम भोजली विसर्जन

लैलूंगा

लैलूंगा संदेश 24

  • सम्पादक – योगेश कुमार चौहान

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छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं में एक खास पहचान रखने वाला भोजली पर्व इस साल भी लैलूंगा के कटकलीया (राजूनगर) गांव में बाजे-गाजे और उत्साह के साथ सम्पन्न हुआ। ग्रामीण अंचल में यह पर्व हरियाली, खुशहाली और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। शनिवार को नवाखाई के मौके पर पूरे गांव में महिलाएं और कन्याएं भोजली लेकर विसर्जन यात्रा में शामिल हुईं और तालाब के घाट पर हर्षोल्लास के साथ देवी भोजली का विसर्जन किया गया

।सुबह से ही गांव की महिलाएं और कुंवारी लड़कियां गेहूं और जौ के बीज से तैयार की गई भोजली को सजाकर सिर पर टोकरी रखकर पारंपरिक गीत गाती हुई जुलूस की शक्ल में घाट की ओर निकलीं। झांझ, मंदारऔर नगाड़ों की थाप पर गूंजते गांव में जब महिलाएं मंगल गीत गा रही थीं, तो पूरा वातावरण आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रंग में रंग गया। बच्चे, बुजुर्ग और युवा सभी इस जुलूस का हिस्सा बने।गांव की महिलाओं ने बताया कि भोजली केवल पूजा-पाठ या परंपरा नहीं है, बल्कि यह खेती किसानी से जुड़ी आस्था का पर्व है। इसमें खेतों की समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामनाकी जाती है। विसर्जन से पहले महिलाओं ने भोजली देवी की आरती उतारी और अच्छे मौसम तथा भरपूर फसल की प्रार्थना की।

इस पर्व का सबसे भावुक और अनोखा क्षण तब देखने को मिला जब गांव की लड़कियों ने ‘भोजली बदना’ की रस्म निभाई। इस रस्म के तहत वे एक-दूसरे के कान में भोजली की बाली लगाकर जीवनभर की दोस्ती निभाने का वचन देती हैं।इस दोस्ती को ‘महाप्रस रिश्ता’ कहा जाता है, जिसम एक-दूसरे को नाम लेकर पुकारतीं, बल्कि हमेशा ‘भोजा या ‘महाप्रसाद’ कहकर संबोधित करती हैं। यह पन सामाजिक भाईचारे और आ विश्वास की मिसाल है।कटकलीया (राजूनगर )गांव में भोज विसर्जन उत्सव को देखने इसमें शामिल होने के आसपास के ग्रामीण भी संख्या में पहुंचे। विसर्जन -2025

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